"युग प्रवर्तक 1008 महाराजा अग्रसेन जी "
महाराजा अग्रसेन जी के पुरूषार्द्ध की गौरवगाथा महर्षि जैमनी ने धर्मज्ञ जन्मे जय को सुनाई जो वेदों तथा समस्त शास्त्रों तथा पुराणों के पंड़ित थे। महर्षि जैमनी ने कहा
'कीर्तिवन्तं: माधोन्तो सगरो दिलीपों भागीरथः ',' व भूव कुकुत्स्थ मरून्तः रघुः नृप रामस्तया । '
इस प्रकार सूर्यवंश में मांधाता, सगर, दिलीप, भागीरथ, कुकुत्स्थ, मरूत्व, दशरथ, रघुराम, राम के पुत्र कुश के वंश में अग्नि-वर्ण कुल में विश्वाजीत, विश्वसेन के
प्रसेनजित उनके वृहत्सेन (पाण्डू के मित्र) महाभारत काल के वृहसेन के बल्लभसेन तथा बल्लभसेन के कुल में महाराजा अग्रसेन का जन्म हुआ।
महाराजा अग्रसेन ने अपनी युवा अवस्था में महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए अनेको यज्ञ एवं तपस्या की तथा धन-धान्य का वरदान प्राप्त किया। तत्पश्चात महाराज
अग्रसेन ने 18 नागवंशीय कन्याओं से विवाह किया। जिसमें से महारानी माधवी जो सबसे अधिक प्रिय थी। जिनके 18 पुत्र हुए तथा सभी पुत्रों का विवाह महारानी के
वंशज (मामा परिवार) की नागवंशीय कन्याओं के साथ हुआ। इन सभी पुत्रों के वंश 16 पीढ़ियों तक अग्रोहा की राजधानी में राज्य करते हुए अपने राज्यों का विस्तार
किया तथा राज्यों को 18 गणराज्यों में विभक्त कर प्रत्येक गणराज्य को अपने पुत्रों का राज्य करने का अधिकार दिया साथ ही 18 प्रकार के यज्ञ करने का संकल्प
लिया तथा प्रत्येक यज्ञ संपन्न कराने वाले मुनियों के नाम पर अपने पुत्रों का नामकरण संस्कार किया। इस प्रकार अग्रवालो के 18 गोत्र हुए।
महाराज अग्रसेन जी ने इस भारतभूमि 108 वर्षों तक राज्य किया। तत्पश्चात वृद्धावस्था में अपने पुत्र विभू को राज्य सौंप तपस्या के लिए वन के लिए प्रस्थान किया।
जय अग्रसेन, जय अग्रोहा
श्री महाराजा अग्रसेन